Sunday, 10 May 2015

हर व्यक्ति का जीवन है ,जरूरतें हैं ;जिसे पूरा करने के लिए हर इंसान अपने मुफीद रास्ता खोजता है | रास्ता हर युग की परिस्थितियों व उपलब्धियों पर निर्भर करता है | सौ साल पहले कुछ तरीके /सुविधाएँ थी ही नहीं जो आज हैं | अत : आज इंसान अपनी जरूरतें जिस तरह पूरी कर रहा है ,पहले वो थी ही नहीं |

आज दलाल युग है |व्यक्ति विभिन्न क्षेत्रों में दलाली करके पैसा कमा रहा है | हो सकता है किसी युग /समय में ये निंदनीय /अनैतिक माना  जाता रहा हो ,पर आज बिना पसीना बहाए ,"स्मार्ट काम" को सर्वोत्तम समझा जा रहा है | आज जिम में पसीना बहाना स्टैण्डर्ड की बात है , खेत में पसीना बहाना शर्म की या प्रतिष्ठा से नीचे समझा जाता है | 

Sunday, 26 April 2015

हमने मोहन जोदाडो से कुछ सिखा

मोहन जोदड़ो, मतलब मृतकों का टीला | ये मृतक कौन थे ? इन्हें किसने मारा ? क्यों मारा ? मरने वालो और मारने वालो दोनों की पहचान अभी तक संदिग्ध है |
सिन्धु की मिटटी, पत्थर, टीले, सड़के, गलियां, सबके अवशेष बताते हैं की उनके पास न कोई धर्म स्थान था न तलवार| वे कृषक थे, शिल्पी थे, व्यापारी थे | फसले उगाना, वस्तुएं बनाना, उनका व्यापर करना, यही उनका रोज़गार था इसी में उनकी ज़िन्दगी रची बसी थी| वे समृद्ध थे, खुशहाल थे | उनके पास अपनी भाषा थी, लिपि थी, पत्थरो पर उकेरा साहित्य इसका गवाह है, पर  अफ़सोस विद्वान् ज्ञानी जन के लिए वह अब भी अपठनीय है | कितनी पीड़ा होती है, जब लिखा हुआ पढ़ा न जा सके | कोई सन्देश छोड़ तो गया है पर.... |
खैर ,अब जो खंडहर है उसी से बूझना है | क्या था? क्या हुआ था ? मृतकों का टीला कभी ज़िन्दगी का समूह भी तो रहा होगा | ये खँडहर ही उस ज़िन्दगी की कहानी बयां कर रहे हैं | ये टूटे है या तोड़े गए हैं, ये मरे है या मारे गए हैं |  सावधान रहना है, चौकन्ना रहना है| जो मारे गए वो तो टीले बन गए ओर मारने वाले...........